" हिमालय से मेरे बाबू "
" हिमालय से मेरे बाबू "
हम बचपन में सब बाते अम्माँ से मनवाते
अपनी दिल की सारी बातें उन्हीं से कह आते
अम्माँ हमेशा हमें मजबूत खंबे सी लगतीं
लेकिन अम्माँ के पीछे हम बाबू को खड़ा पाते ,
बाबू हमारे स्कूल नहीं कभी जाते थे
हमारे वार्षिकोत्सव में नहीं कभी आते थे
हमेशा आगे की पंक्ति में अम्माँ ही दिखती थीं
लेकिन अपनी सहमति के साथ उनको बाबू ही तो भेजते थे ,
हमें कभी कोई रोक - टोक सी नहीं थी
कभी कोई बंदी - पाबंदी भी नहीं थी
सारे बंद दरवाज़े अम्माँ ने ही खोला था
लेकिन दरवाज़े की सांकल बाबू ने ही तो गिराई थी ,
हम लड़कियाँ है इसका एहसास हुआ ही नहीं
लड़कों से अलग हैं ये एहसास छुआ भी नहीं
आधुनिकता का पाठ अम्माँ ही तो पढ़ाती थीं
लेकिन वो पाठ बाबू से ही तो पढ़ कर आती थीं ,
हम भाई - बहन जब लड़ते थे
नहीं हम - सब जब पढ़ते थे
तब अम्माँ ने ही तो ट्यूशन लगवाई थी
लेकिन ट्यूशन की बात उनको बाबू ने ही तो समझाई थी ,
उस उम्र में हम जो थोड़ी सी भी ग़लती करते थे
बड़ों की किसी बात को अनसुनी करते थे
अम्माँ अनुशासन की दीवार सी बन जाती थीं
लेकिन उस दीवार का गारा तो बाबू ही बनते थे ,
हम ज्यों - ज्यों बड़े होने लगे
तब त्यों - त्यों हम समझने लगे
हमारी अम्माँ तो एक माध्यम थीं
उस माध्यम का संबल तो थे मेरे बाबू
जो हमें हिमालय से लगने लगे ।
