हे मेरे गुरु
हे मेरे गुरु
हे मेरे गुरु,
एक दिन बैठ ही गई,
आपका गुणगान करने मैं,
लेकिन कहाँ से शुरू करूँ,
आपकी तारीफ में ?
बोलने को शब्द नहीं है,
पर ज़बान ज़रूर है,
लिखने को स्याही नहीं पर,
प्रष्ठ रुपी आसमान ज़रूर है।
शब्द ज़रूर छोटे हैं,
पर हिम्मत कर ही ली है मैंने।
तो हो जाऊँ अब विलीन मैं,
आपकी तारीफ करने में लीन मैं।
आप हो ज्ञान का सागर ऐसा,
मेरा मन तो है उसमें छोटी-सी नौका,
आपका साथ है उस सागर की लहरों जैसा,
आपकी उन लहरों ने किनारा दिखाया मुझे।
ज़रुरत और दिखावे में फर्क बताया मुझे,
अंधेरे में टकराती मैं प्रकाश बनकर,
रोशनी से रूबरू कराया मुझे।
ख्यालातों में खोई मैं अपनी,
आँखों से दुनिया दिखाई मुझे,
ये दुनिया थी सिर्फ जीने का साधन,
सांस लेने की असली वजह बताई मुझे।
हर व्यक्ति में कमी निकालती चली मैं,
सोचने की असली वजह समझाई मुझे,
ज़रुरत के वक्त मदद माँगने और,
दूसरों की ज़रुरत में खड़े,
रहने का साहस दिया मुझे।
घमंड से भरपूर इस आत्मा को अपनी,
परछाईं में अपनी झलक,
देखने के लिए दर्पण दिया मुझे।
चिंगारी थी ये सोच मेरी,
जिसे अग्नि बनाया आपने,
हवा का झोंका थी काबिलियत मेरी,
जिसे गुणों का सैलाब बनाया आपने।
बंजर रेगिस्तान की रेत थी उम्मीद मेरी,
जिन्हें चिकनी मिट्टी का घड़ा बनाकर,
उसमें हिम्मत का प्रवेश कराया अापने,
आसमान देख सपने सजाती रही मैं,
उन्हें पूरा करने की चाहत जगाई आपने।
किसी की तारीफ में कभी,
एक शब्द नहीं कहा मैंने,
पर आपके चरित्र ने सिर झुकाकर,
गिरने पर मजबूर किया है मुझे।
थोड़ी बेवकूफ़-सी थी मैं,
इस हाड़-मॉस के ढांचे से,
भावनाओं से युक्त इंसान बनाया है मुझे।
गले मिलने की हैसियत नहीं है मेरी,
बस चाहत है इतनी की आपके,
चरणों में शरण मिल जाए मुझे।
