हाँ मैं नदी हूँ
हाँ मैं नदी हूँ
कल -कल छल- छल बहती जाती
निर्मल जल से सब की प्यास बुझाती
चुपचाप आगे बढ़ती जाती अपनी
आत्मकथा भला किसे सुनाती
बड़े -बड़े चट्टानों पर पर्वत, पक्षी
को भला दर्द यह कैसे समझाती
नदी, नहर, सरिता, शिप्रा
सब मैं कहलाती
पशु, पक्षी, खेत, खलिहान सबकी
हर पल मैं प्यास बुझाती
मैं कौन हूं? कहां से आई हूं?
बस निरंतर बढ़ती जाती हूँ
बिना रुक, बिना अटके कहीं
पर्वत झरनो सा बहती जाती हूँ
कभी तेज, कभी धीमा और
कभी संकरी, कभी चौड़ी
कभी मस्त अल्हड़ सी अपने
धुन में आगे बढ़ती जाती हूँ
धरती, मनुष्य, पशु, पक्षी,खेत,
पेड़-पौधे सब की प्यास
पल भर में बुझा जाती हूँ
हरा-भरा करके जीवन को
सबके सफल बनाती हूँ
चुपचाप अब बस बह रही हूँ
चुपचाप मन ही मन रो रही हूँ
अपनी हालत पर जो सबके लिए
कभी पुजनीय होती थी
आज कई जगह गंदगी से भरी हुई हूँ
फूल ,माला कचरे फेंक कर जाते
मुझे गंदा करके बहुत सताते
बहकर कल-कल,छल-छल
करती जाती खुद को आगे
साफ कर बढ़ती जाती
अपने जल को जीवन के लिए
सुरक्षित करती जाती
जहां जहां मैं जाती हूँ
सबकी प्यास बुझाती हूँ
हरा-भरा बनाती हूँ
पत्थर, पर्वत से बढ़ती जाती हूँ
मैं नदी हूँ हाँ मैं नदी हूँ अपनी
आत्मकथा किसे सुनाऊँ?
किसे सुनाऊँ? हिमालय से बहकर
पहाड़ों झड़ने से बहकर आपके पास
आई हूँ कभी पहाड़ों से गिरती
कभी झरनों से बहती तेज गति
से हाँ मैं आई हूँ टेढ़ी-मेढ़ी
बहती हूँ कभी नहीं मैं थकती हूँ
हरा भरा कर देती जग को
जहां से मैं गुजरती हूँ
एक ही आस है बस मुझे
मेरे जल को दूषित होने से बचा लो
मुझसे ही जीवन है जीवन सजा लो
सारा जीवन, खेत, खलिहान, पशु सब
मुझसे ही हैं मैं नदी यही बस कहती हूँ
दिन रात में तुम्हारे लिए ही बहती हूँ
हर दर्द सहती हूँ
बस साफ सुथरा रखो मुझ को
यही विनती आज करती हूँ "हाँ"
मैं यही विनती आज करती हूँ
हाँ "नदी हूं मैं"
