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Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

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Chandresh Kumar Chhatlani

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गुनाह का इनाम

गुनाह का इनाम

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वह बहुत बोलता था,
मुंह खोलता तो सच ही बोलता था।
भीड़ में अकेला, पर डटकर खड़ा,
झूठ से उसका कोई समझौता न था।


लोग चिढ़ते, कभी डर भी जाते,
उसकी बातें दिल को चीरती थीं, चुभ जाती थीं।

उसका सच दूसरों को कड़वा लगता था,
मीठे झूठों की आदत बन चुकी थी सबकी।

सच सुनते ही चेहरों पर असहजता छा जाती,
आइना दिखाने वाला दुश्मन बन जाता।

फिर, एक दिन भीड़ ने उसे मंच पर बुलाया,
भीड़ ने ताली बजाई, 
भीड़ ने उसे तमगे दिए,
प्रशस्तिका पढ़ी।

और अब,
अब, बोलने वाला चुप है,
सच बोलना एक ऐसा गुनाह है, जिसका इनाम देकर,
सच्चाई की रोशनी बुझा दी जाती है।


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