STORYMIRROR

Madhu Vashishta

Tragedy

4  

Madhu Vashishta

Tragedy

गर्म हवाएं

गर्म हवाएं

1 min
7

ये गर्म हवाएं और शीतलता की बेरुखी। 

इतनी गर्मी में अंतर तक हो रहे लोग दुखी।

सोचा है मौसम की क्यों है यह बेरूखी?

प्रकृति के साथ भी तो खिलवाड़ कर रहे हैं सभी। 

काट रहे हैं पेड़ और उग रहे हैं कंक्रीट के जंगल सभी। 

ऊंची ऊंची इमारतों को देखकर गर्म हवाओं का बढ़ना तो जारी रहेगा ही। 

काट दिए जो पेड़ आपको कितना पड़ेगा तो सभी को ही। 

यह भी ना सोचा कि धरती में कहां से लगे नमी।

पानी की प्रदेशों में होती जा रही है कमी। 

सफल लोग तो चला चला के ऐसी बना रहे हैं धरती का तापमान भी। 

छोटे-छोटे पौधे भी मरती जा रहे हैं, 

लुप्त हो रहे हैं बहुत से पक्षी भी। 

मानव संभल जा प्रकृति भी दे रही है चेतावनी अभी। 

अपनी नई पीढ़ी को देकर जाओगे क्या कुछ भी नहीं।

तुम्हें तो मिले थे विरासत में 

हरियाली और नदियां भरी।

यह कारण हवाई और   शीतलता की बेरुखी।

इसके लिए जिम्मेदार हो आप और हम सभी।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy