STORYMIRROR

Priyank Khare

Tragedy

3  

Priyank Khare

Tragedy

गरीबी

गरीबी

1 min
12K

नमी है उन आंखों में अश्क़ निकलता नहीं

भूख की तड़प से अब इंसान सहता नहीं


नसीब में होता नही वो एक वक्त का निवाला

महामारी के दौर में भटक रहा वो मारा मारा


दर दर की ठोकरे खाता वो बदतर है जिंदगी

गरीबी है इस कदर शायद इम्तिहान है जिंदगी


तन, बदन ढ़कने को वो पोशाक नहीं मिलता

उम्मीदों की किरण लिए वो दिन-रात है जीता


तपती धूप में निकल पड़ता है हर एक राह में

मिल जाये शायद एक निवाला उसकी चाह में।



ഈ കണ്ടെൻറ്റിനെ റേറ്റ് ചെയ്യുക
ലോഗിൻ

Similar hindi poem from Tragedy