गरीबी
गरीबी
गरीब हूं इसीलिये आज भी सड़क पर सोता हूं
खाने को ना हो रोटी तो आज भी रोता हूं
सर पर छत नहीं हमारे है
खाली पड़े खाने के बर्तन सारे हैं
दिल भी सिसक के रोता है
जब बच्चा मेरा भूखा सोता है
गरीब की थाली में सिर्फ सूखी रोटी होती है
जिसे देखकर ही कभी पेट भर जाता है
बच्चे पेट भर खाना खा सके
इसीलिये कभी झूठ भी बोल जाता हूं
कड़ी धूप की गर्मी में पसीना बहाता हूँ
आंधी, तूफान, बारिश की मार मैं झेलता हूं
एक जोड़ी कपडे में जिंदगी गुजारता हूं
पर सड़क पर भीख न मांगू इस खुद्दारी से जीता हूं
बच्चे पढाने के लिए पैसे नहीं होते हैं
इसीलिये सरकारी स्कूल में भेजता हूँ
उनसे मैं बाल-मजदूरी करवाऊँ
गरीब जरूर हूं पर इतना भी जालिम नहीं हूं।
