STORYMIRROR

Om Prakash Fulara

Tragedy

3  

Om Prakash Fulara

Tragedy

ग़रीब

ग़रीब

1 min
343

देखो

वह आज 

फिर मचल रहा

उस खिलौने के लिए

जिसे देखा था उसने

किसी अमीर के हाथ में

वह क्या जाने

अमीरी और गरीबी का अंतर

उसकी नजर में तो

वह भी बच्चा है

उसी की तरह।


तड़प रहा है वह

रोटी के टुकड़े के लिए

हाथ में देख 

उसके ब्रेड का टुकड़ा

वो क्या जाने

रोटी और ब्रेड का फर्क

उसने तो

देखा है केवल

सुखी रोटी का टुकड़ा।


उसे तो बस भूख है

नहीं है समझ

नहीं आता अंतर करना

क्योंकि

उसकी भावनाएं

निश्छल हैं

कोमल हैं।


ग़रीब तो बना दिया

हमने उसे

जन्म से ही

वरना वह तो

अमीर है

उसके पास है

कुबेर के खज़ाने सा

प्रेम रूपी

अथाह धन

जो कभी खत्म

नहीं हो सकता।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy