STORYMIRROR

Om Prakash Fulara

Abstract

2  

Om Prakash Fulara

Abstract

डरो ना

डरो ना

1 min
184

भी क्यों डरे हो,

दुख रहत नहीं,

है सदा ही किसी के।


छोड़ो माया बसी जो,

रहत दुख सभी,

साथ में ही इसी के।


फैला है जाल जो भी

उर यह तम का

दो मिटा आज सारा।


तुम्हारे भाग्य में भी

सकल जगत का,

नित्य है राज सारा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract