गजल (पहचान)
गजल (पहचान)
खुद को खुद की पहचान भी इतनी जरूरी हो गई,
जितनी दूसरे के लिए मजबूरी हो गई।
कभी खुद के साथ समय बिता कर तो देखो,
सभी का बनने से पहले,
खुद को आजमा कर तो देखो।
अपनों के संग फासले आ जाते हैं जब, नजदीकीयाँ
खुद से बढ़ जाती हैं इस कदर,
किसी के खोने का डर रहता है, दिल की धड़कने बढ़ जाती हैं।
घूमता है मन हर पल तलाश में किसी की,
न जाने कहाँ से कहाँ,
नजर न आने पर अहमियत खुद की बढ़ जाती है।
होता अगर वक्त कभी खुद को जान लेने का,
नहीं होता डर किसी के भाग जाने का।
किसी को जानने से नजदिकियां बढ़ जाती हैं,
नहीं मिलता जब चैन खामोशियों छा जाती हैं।
साथ छूट जाती है जब खुद की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं,
पहचान हो जाती है अपनेपन की जब मजबूरियाँ बढ़ जाती हैं।
नहीं मिलता सहारा जब दिल को तो तन्हाईयाँ बढ़ जाती हैं,
रातें हो जाती हैं लम्बी दुश्वारियाँ बढ़ जाती हैं।
सवाल एक एक पूछता है अक्सर इंसान आपने आपको,
कसूर अपना ही था फिर क्यों कहता है मजबूरियाँ बढ़ जाती हैं।
क्यों लगाते हो बेहिसाब लगन इस कदर, की बेवजह,
बेशुमार बेरहम मजबूरियाँ बन जाती हैं।
लगाई होती इस कदर सच्चे प्रभु से लगन सुदर्शन,
हर सवाल जवाब मिलता तुझे क्यों अपनों से अक्सर दूरियाँ बन जाती हैं।
