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Prafulla Kumar Tripathi

Inspirational


4.5  

Prafulla Kumar Tripathi

Inspirational


इतिहास कब का बन चुके !

इतिहास कब का बन चुके !

1 min 291 1 min 291

फर्श से हम अर्श तक थे जा चुके ,

अर्श से अब फर्श पर हैं आ गये ।

सपने देखे थे जो हमने कल तलक ,

टूूूट कर इतिहास कब का बन चुके।।


खेेेत - खलिहानों से चलकर ,

शहर तक हम छा चुुुके थे ।

देेेश की सीमा को छोड़े ,

विश्व को अपना लिये थे।।


धरती अपनी , मूल्य अपने खो चुुके,

कुुुदरती अभिशाप के भागी बने ।

जड़ तो कब की ठूंठ बनकर रह गई ,

तने तो अब ख्वाब बनकर रह गये ।।


जीभ इतनी मनचली पहले न थी,

आत्म अनुशासन के शासन से बंधी थी ।

चर अचर सब अपने हित औ' मीत थे,

नीतिगत संस्कृति से सबकी प्रीत थी ।।


एक झोंंका कोरोना .. ऐसा चला ,

अपने अपनों से ही इतना डर गये ।

फिर शुरू करनी पड़ेेेगी यात्रा ,

जो पढ़ें थे आज सब कुछ धुुुल गये ।।


फर्श से हम अर्श तक थे जा चुके ,

अर्श से अब फर्श पर फिर आ गये ।

सपने देखे थे जो हमने कल तलक ,

टूट कर इतिहास कब का बन गये ।।



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