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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract Tragedy Inspirational


4.5  

Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract Tragedy Inspirational


"घनघोर अंधेरा"

"घनघोर अंधेरा"

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रात्रि का बड़ा घनघोर अंधेरा है

वक्त भी आज तो ठहरा-ठहरा है

लग रहा, कोई नहीं सगा मेरा है

यहां तो सिर्फ अकेलापन मेरा है


चुप्पी के इस आशियाने से भी,

आ रहा, स्वर बड़ा ही गहरा है

टिमटिमाते तारों को देखता हूं,

इनमें क्या कोई जख्म गहरा है?


चुप है, फ़लक, चुप है, आज जमीं,

हर तरफ छाया, केवल अंधेरा है

इस अतीत से हर कोई परेशान है

स्व कमी, कोई न कहे दोष मेरा है


हर व्यक्ति, कमियों का एक चेहरा है

छोड़ दे भूतकाल की बुरी यादों को,

वर्तमान पर लगा, भूत का पहरा है

हर ओर लगा निशाचरों का डेरा है


अपने आप को सुधार ले, इससे बड़ा,

न कोई कर्म, साखी जग में सुनहरा है

रात्रि का भले बड़ा घनघोर अंधेरा है

कर्मवीर को लगता, यह वक्त मेरा है


करूँगा अपने सब स्वप्न साकार,

कठोर मेहनत का वक्त सुनहरा है

अगर होना है, तुझे सफल साखी

हो, जाना तू इस दुनिया में बहरा है


रात्रि का बड़ा ही घनघोर अंधेरा है

भीतर रख सकरात्मकता का डेरा है

घट से मिटा नकरात्मकता बसेरा है

कर्म दीप्ति से ही उगेगा,नव सवेरा है



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