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कवि धरम सिंह मालवीय

Romance

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कवि धरम सिंह मालवीय

Romance

ग़ज़ल

ग़ज़ल

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एक हवा का झोंका लगा था अभी

तेरी चूनर भी सर से सरकने लगी


मैने चुपके से छत पर बुलाया तुझे 

तेरी पायल निगोड़ी छनकने लगी


हाथ तेरा जो थामा था मेरे हाथ में 

तेरी चूड़ी खन खन खनकने लगी


मैं जब तक दिखाता चाँद तारे उसे

बिंदिया तारों के जैसे चमकने लगी 


सोचा आगोश में आज भर लूँ तुझे

मेरी आँख अब क्यो फड़कने लगी


दोनों हाथों से मैंने जो थामा तुझे

तेरी कम्मर सज़र सी लचकने लगी


तुझको कहना तो चाहा प्यार के बोल तीन

पर न जाने ज़ुबा क्यों अटकने लगी


हुश्न और य इश्क मुज़स्मा देखकर

मेरी नजरे क्यो ही अब भटकने लगी


तेरी इबादत जो कि नाम तेरा लिया

तेरी रहमतें मुझ पर बरसने लगीं!



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