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ANIRUDH PRAKASH

Abstract

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ANIRUDH PRAKASH

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Ghazal No. 36 हवादिसों में डूबी एक दास्ताँ है सुनानी उन्वान जिसका है ज़िन्

Ghazal No. 36 हवादिसों में डूबी एक दास्ताँ है सुनानी उन्वान जिसका है ज़िन्

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अपना अपना नजरिया अपनी अपनी है तर्ज़ुमानी 

किसी के लिए है हश्र बरपा किसी के लिए है जवानी


हवादिसों में डूबी एक दास्ताँ है सुनानी 

उन्वान जिसका है ज़िन्दगानी


झूठ की बातों में है गज़ब की रवानी

सच की ख़मोशी यहाँ किसको है भानी


ये तर्क-ए-इश्क़ ये तौबा-ए-मय ये भी कोई है ज़िन्दगानी 

वाइज़ तेरा जीना-मरना तो यहाँ है बे-मा'नी


चुनता रहा काँटे मैं अपनों की राहों से ये सोचकर कि है ये निस्बत-ए-निगरानी  

बेखबर की उन काँटों की बौछार अब मेरे घर ही है आनी


हुकूमत के लिए तो गुफ़्तगू का बस ये ही है मा'नी 

क़सीदा-ए-सल्तनत है शोख़-बयानी और ज़िक्र-ए-हक़ ज़हर-फ़िशानी


मेरी आँखों ने यूँ ही नहीं कर रखी है ग़मों की मेज़बानी 

मेरे अश्क़ों की होती है उन्हीं से आब-रसानी


जिस दास्ताँ को सुनाने में हमें लग जाती है ज़िन्दगानी

कमबक्त एक शेर में बयाँ कर देता है वो ये सारी कहानी


एक बार हमें साक़ी की वफ़ा है आज़मानी 

रकीबों से अपने जाम की उससे करानी है निगहबानी


इस शिकस्त-ए-दिल को उनसे अभी भी है उम्मीद-ए-मेहरबानी 

ज़मीं पर गिर के उठे भी नहीं और ख़्वाब आसमानी


वो मुस्करा के बोले 'प्रकाश' ये कार-ए-सुख़न तो है वक़्त-ए-राइगानी

मैंने कहा मशवरे का शुक्रिया मगर मेरी वो किताब-ए-सुख़न आप को है लौटानी।।


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