"गांव की परंपरा"
"गांव की परंपरा"
जहां सुख-दुख सबके एक रहे जहां मिल के सारे काम चले।
वो गाँव हो ऐसी जगह है जहां हर दिल इक दूजे से प्रेम करे।।
मिट्टी की सौंधी खुशबू से नित्य नये वहाँ सपने बुनते।
हरियाली खेतों की देख-देख सभी के दिलों में गुल खिलते।।
जहां बड़ों का आदर सम्मान रहे ना उनके सामने बोल निकलते।
मर्यादा रहती जीवन में ऐसे अनुशासित सब रहते।।
सब मिलकर हाथ बढ़ाते हैं एक दूजे का स्तंभ बन जाते।
पा जाते हैं मंजिल अपनी जब सब मिलकर हाथ बढ़ाते।।
घर छोटे बड़े से काम नहीं दिल के दरवाजे सब चौड़े होते।
खुशियों में गुजराती शाम वहां सुबह की लाली जगमग करते।।
है परंपरा गांव की यही हर दिन नए-नए जुमले बनते।
बैठ चबूतरों पर हर दिन वार्तालाप के हर दिन नए दौर चलते।।
