STORYMIRROR

Govindprasad Oza

Drama

3  

Govindprasad Oza

Drama

एक शून्य

एक शून्य

1 min
524

साँसे मेरी थमने को है

आँसुओं का सैलाब बहने को है

मुस्कान मेरी मानो गुजर सी गई

सभी तस्वीरें गिर कर बिखर सी गई

कुछ बचा नहीं सिर्फ

एक शून्य।


पास आने में साये भी कतराने लगे हैं

फूल भी दूरियाँ बढ़ाने लगे हैं

चाँद भी दूर हो गया घने बादलों में

अब मुझसे

सूरज भी कहीं छिप गया आँधियों में

बचा नहीं कुछ भी

सिवाय शून्य के।


रिश्तों की आहट भी उलझाती है मुझको

अपनों से जी घबराता

पथरा जाती आँखें कई मर्तबा

साँसे रुकी हुई सी लगती

जब पास होता है सिर्फ

एक शून्य....।।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Drama