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Sulakshana Mishra

Abstract

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Sulakshana Mishra

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एक मुट्ठी ज़मीन

एक मुट्ठी ज़मीन

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वो डर था गहरा

ख्वाबों के टूट जाने का

कि नींद से ही हमने

किनारा कर लिया।

उम्र थी लम्बी मगर

सुकून का इक पल भी कभी

मयस्सर न हुआ कभी ।

जी सकते थे हम भी 

एक आम सी ज़िन्दगी।

मगर रोज़ मर मर के जीना

हमको यूँ गवारा न हुआ।

यूँ तो जीने की कोई 

शर्त न थी हमारी

पर बंदिशों से और बेड़ियों से

कभी हो न सकी अपनी यारी।

घुटन सिर्फ हवाओं में न थी

शख्सियत भी दम तोड़ती थी

जब टूटती कोई उम्मीद थी।

सिर्फ आँखों में लिखा दर्द

कोई कब तक पढ़े?

बयाँ कर सके जो दर्द

ख्वाबों के टूट जाने का

वो ज़ुबाँ भी किसी को 

कभी तो बनानी चाहिए थी।

ऐसा न था कि चाहत थी सिर्फ 

खुले आसमान की

पर एक मुट्ठी ज़मीन तो चाहिए थी

यूँ हवाओं में कैसे पाँव मैं जमाती ?



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