एक हांडी,दो पेट
एक हांडी,दो पेट
कभी सुनाती थी मेरी दादी और नानी,
लोककथा से चुनकर एक विशेष कहानी !
श्रवणकुमार की पत्नी थी ज़रा अज्ञानी,
उसने जीवन की एक यही रीत ना जानी !
कि.. माता पिता की सेवा एक कर्तव्य है
जो एक दिन पड़ती सबको है निबाहनी !
श्रवण के माता पिता को खीर थी खानी,
उसने माटी की हांडी बीच भेद की ठानी !
आधी हांडी में दूध की खीर में डाल खुबानी,
दूसरी तरफ हांडी में डाली सिर्फ गुड़ और पानी !
सब समझ गई श्रवण कुमार की मैया थी सयानी,
बोली, ऐसा क्षीर भोजन पाकर तृप्त हुई ब्राह्मणी !
सांकेतिक भाषा से समझ गए श्रवण थे बड़े ही ज्ञानी,
अपने हिस्से की खीर परोसकर मातपिता को खिलाए दानी !
