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एक ग़ज़ल

एक ग़ज़ल

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रब के हाथों की हैं हम कठपुतलियाँ

नाचती हैं उसके दम कठपुतलियाँ


क्या नहीं करती बताओ मुझ को ये

बोलिये हैं किस से कम कठपुतलियाँ


नाचकर फिर बाँध थैले में चली

दर्शकों के हाल-ग़म कठपुतलियाँ


आज कुछ हैं कल न जाने क्या बनें

कितने लेती हैं जनम कठपुतलियाँ


खोलती हैं पोल सबकी सबके बीच

ढा रहीं कैसा सितम कठपुतलियाँ


भावहीना ख़ुद हैं पर जादू है ये

आँखें कर देती हैं नम कठपुतलियाँ


थाम ली डोरी सिपहसालार ने

और सियासत की हैं हम कठपुतलियाँ


छोटा सा आदेश ऊपर से मिले

और बन जाती हैं यम कठपुतलियाँ


अपने पर इनका कोई अंकुश नहीं

खींचतीं हैं रम-चिलम कठपुतलियाँ।


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