एक और यथार्थ - - दो शब्द
एक और यथार्थ - - दो शब्द
जलती हुई मोमबत्ती
अपनी कंपकंपाती लौ से तिमिर को हटाने की कोशिश में लगी थी-
उस अंधेरी रात में काट रहे थे अकेलेपन के खटमल,
और तन्हाई की वेदना में उसकी आंखें जगी थी-
एक चारपाई,
एक तकिया और आवरण हीन रजाई-
एक घड़ा, एक मग, चपटी हुई थाली, दरवाजे की दरारों से आती हवा, बस यही थी उसके अंतिम घड़ी की कमाई-
अपनी हालत देखकर उसे लगा कि
जलती हुई मोमबत्ती थोड़ा थोड़ा मुस्करा रही है-
और आहिस्ता आहिस्ता जलते हुए भी
जीवन का एक यथार्थ दिखला रही है-
रे मानव
आज तू अपनी इस हालात पर रो रहा है-
तूने जिंदगी भर जिनके लिए अपने को लुटा दिया
उनकी यादों में अब भी खो रहा है-
मैं एक बात करूं अर्ज -
भूल जा तूने किसके लिए क्या किया
यह बदले में कुछ चाहत की भावना छोड़ कर मेरी तरह सोच की वह था तेरा फर्ज -
गर सोचता रहा सूदखोरों की तरह कि संबधो को दिया गया वक्त, धन, या अहसास था तेरा कर्ज -
तब तू भी औरों की तरह कहलायेगा खुदगर्ज-
और ताजिन्दगी उठाता रहेगा दर्द -
मुझे देख
तेरा तिमिर दूर करने के लिए जल रहीं हूं-
पल पल जलते - पिघलते अपने अस्तित्व को खो रही हूं-
जब दर्द की इंतहा हो जाती है तो आंसु की बूदों की मानिंद धीरे धीरे छलक रहीं हूं-
मेरे ढलके हुए आसुंओ को निर्जीव मोम समझ कर
एक बार फिर धागे की बत्ती लगाकर तू जला देगा-
मेरे दर्द के अहसास को न समझेगा
बस अपना अंधेरा कुछ पलों के लिए दूर भगा लेगा-
यही है जिन्दगी का सत्य
जब तक तू किसी की जिंदगी को रोशन करने के लिए जलता रहेगा -
जब तक किसी काम आता रहेगा और दूसरों के लिए मरता रहेगा-
तेरे दर्द को कोई नहीं समझेगा कि
तेरी अंतरात्मा भी किसके के लिए और दर्द में कितना रोती है-
तभी तक तेरी कीमत है, जब रोशनी देने की तेरी औकात होती है।
