STORYMIRROR

Harshita Srivastava

Classics

3  

Harshita Srivastava

Classics

दुल्हन

दुल्हन

1 min
250

ठंडी सदाओं में

दुल्हन सी बैठी 

है पीली चुनरी 

ओढ़कर 


पंक्षी के गीत पर

थिरकती बहकती

जल के बहाव को


अपलक निहारती 

हुईं मानों

कहरही हो 

इससा चंचल मेरा 

भी मन है


खग के पंखों पे

अचरज करती 

छूती आकाश के 

रंगों को

पैरों में पहन रखी है


हरी भरी घासों की पायल

अपना मटमैला संभालती

कानों में विविध फूलों

के कुडंल पहने। 


बादलों का काजल 

लगा अपनी सुन्दरता

पे हर्षाती। 


ओह ! धरा आज वसंत

में सबके मन को 

कितना मोह रही है ना। 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics