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V. Aaradhyaa

Classics

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V. Aaradhyaa

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दुःख मन में रखो और सुख बांटो

दुःख मन में रखो और सुख बांटो

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आज फ़िर दुःख मिला मुझसे 

थोड़ा नाराज थोड़ा अनमना होके , 

कहने लगा ...

मेरे मना करने क़े बावजूद 

तुमने मुझे दुसरों में बाँटा क्युँ ? 


अपने हुए औऱ भी उदास 

औऱ अपने दुश्मनों क़ो 

औऱ भी ख़ुश कर दिया यूँ :

औऱ तुम्हे क्या लगता है, 

 इससे तुम खुश हो जाओगी ?


दुःख सबसे शेयर करके तुम 

क्या हल्की हो पाओगी ? 

देखो , तुम्हारा कठिन 

परिश्रम ही मुझे तुम्हारे 

जीवन से दूर कर सकता है;

 बाकि तुम आजमा क़े देख लो ,

तुम्हारे दुखी होने पे कौन 

तुमपे कितना हंसता है। 


भूल गए सब जो माँ ने सिखाया , 

दुःख सूख जैसे अपना है साया;

जब भोर औऱ साँझ क़ो 

दोनों हाथ फैलाकर अपनाते हो; 

तो भला ख़ुशी तक तो ठीक 

दुःख से इतना क्युँ घबराते हो ?


क्या तुमने रात क़े हाशिए से 

सूरज क़ो जनमते नही देखा ? 

य़ा गर्मी से कुम्हलाए पौधों क़ो 

बारिश की बूंद पड़ते ही 

लहलहाते नही देखा ?


चलो, अब आँसू पोछ डालो;

अपनी नाव फ़िर से भँवर में डालो:

अबकी चप्पू ज़रा तेज चलाना, 

बीच सफ़र में मत रूक जाना

देखना ....

अबके सफलता मिलके रहेगी , 

ख़ुशी भी भला अब कितने दिन 

दूसरे के घर में रहेगी ! 


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