दुःख मन में रखो और सुख बांटो
दुःख मन में रखो और सुख बांटो
आज फ़िर दुःख मिला मुझसे
थोड़ा नाराज थोड़ा अनमना होके ,
कहने लगा ...
मेरे मना करने क़े बावजूद
तुमने मुझे दुसरों में बाँटा क्युँ ?
अपने हुए औऱ भी उदास
औऱ अपने दुश्मनों क़ो
औऱ भी ख़ुश कर दिया यूँ :
औऱ तुम्हे क्या लगता है,
इससे तुम खुश हो जाओगी ?
दुःख सबसे शेयर करके तुम
क्या हल्की हो पाओगी ?
देखो , तुम्हारा कठिन
परिश्रम ही मुझे तुम्हारे
जीवन से दूर कर सकता है;
बाकि तुम आजमा क़े देख लो ,
तुम्हारे दुखी होने पे कौन
तुमपे कितना हंसता है।
भूल गए सब जो माँ ने सिखाया ,
दुःख सूख जैसे अपना है साया;
जब भोर औऱ साँझ क़ो
दोनों हाथ फैलाकर अपनाते हो;
तो भला ख़ुशी तक तो ठीक
दुःख से इतना क्युँ घबराते हो ?
क्या तुमने रात क़े हाशिए से
सूरज क़ो जनमते नही देखा ?
य़ा गर्मी से कुम्हलाए पौधों क़ो
बारिश की बूंद पड़ते ही
लहलहाते नही देखा ?
चलो, अब आँसू पोछ डालो;
अपनी नाव फ़िर से भँवर में डालो:
अबकी चप्पू ज़रा तेज चलाना,
बीच सफ़र में मत रूक जाना
देखना ....
अबके सफलता मिलके रहेगी ,
ख़ुशी भी भला अब कितने दिन
दूसरे के घर में रहेगी !
