"दो जून रोटी"
"दो जून रोटी"
मुश्किल हो गई, दो जून की रोटी
महंगाई खा रही है, सबकी बोटी
अब भला में कहां से लाऊं, रोटी
महंगाई हो गई, आज इतनी खोटी
आंसुओं से भी न बुझ रही, प्यास
दरिया भी निगल चुके है, मोती
मुश्किल हो गई दो जून की रोटी
महंगाई काट रही, सबकी चकोटी
भुखमरी, अफरातफरी माहौल है,
महंगाई खोल रही, सबकी लँगोटी
अमीर खा रहे, बहुत सारे पकवान
गरीब को न मिल रही, सूखी रोटी
अमीर ओर ज्यादा अमीर, हो रहे
गरीब ओर ज्यादा गरीब, हो रहे
कैसी है, इस जीवन की कसौटी
सर्वत्र खोली हमने भेदभाव टोंटी
सरकार ध्यान दे, दीन सम्मान दे
विकास की जिंदगी होगी, छोटी
बगैर किसान, गरीबों के, यह देश
कैसे चढ़ेगा, माउंट एवरेस्ट चोटी
बहुत बड़ा हिस्सा, गरीबों का है,
गरीबों को न मिली दो जून रोटी
तुम्हारी किस्मत होगी, सेठों खोटी
पेट पर तुम्हारे चर्बी इतनी मोटी
क्या, करोगे तुम शारीरिक श्रम?
निकल जायेगी हेकड़ी, सब छोटी
वही देश वाकई उन्नति करता है
जहां, गरीबों की सही कद्र होती
आपको जहां कहीं गरीब दिखे,
नाक सिकुड़ने का प्रयास न करे
दीन की पहनते, दीनानाथ धोती
उनकी ही किस्मत कभी न रोती
जो दीन को देते दो जून की रोटी
उसके जीवन में कभी रात न होती
जो दीन-हीन को बने जीवन-ज्योति
उसे ईश्वर बनाता है, कोहिनूर मोती।
