दिल से दिल की दूरी
दिल से दिल की दूरी
दिल से दिल की दूरी है
न जाने कैसी मजबूरी है।
राह चलते एक रोज हुई थी
उनसे मुलाकात
वो मुलाकात आज भी अधूरी है
दिल से दिल की दूरी है
न जाने कैसी मजबूरी है।
सोचा था सीने से लगाएंगे
इक रोज वो हमको
चाहत मेरी वो आज भी अधूरी है
दिल से दिल की दूरी है
न जाने कैसी मजबूरी है।
बहुत सोचा तो बात समझ में आयी
शायद उनकी भी कोई मजबूरी है
तभी तो चाहत मेरी आज भी अधूरी है
दिल से दिल की दूरी है।
दिल की हर ख्वाहिश
कभी होती नहीं पूरी है
तभी तो चाहतें बहुत सी
आज भी अधूरी हैं
दिल से दिल की दूरी है
न जाने कैसी मजबूरी है।

