दिल से आशा दिलाशा नही
दिल से आशा दिलाशा नही
सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2014 में अहम फैसला दिया।
ट्रांसजेंडर को तीसरे लिंग के रूप में पहचान दे दी।
हर क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक,
शिक्षा और नौकरी के फार्मों में थर्ड जेंडर की जगह मिल गई है।
पर एक सवाल अब भी बना हुआ है।
दिल में, समाज में, परिवार में जगह कब मिलेगी ?
दे दी तसल्ली समाज ने कि हम भी जिंदा हैं।
पर क्यों जाने समाज हमसे आज भी शर्मिंदा है?
हमने नही चुना ये शरीर,जो दिया प्रभु ने स्वीकारा है।
धैर्य रखा के अपना लें,अपनों ने अपना कहां माना है।
कैसे जियें? भूंख है,बस यही सच,ना कोई बहाना है।
जन्म लिया तिरस्कार में जिए,समझा यही जीवन है।
घर छूटा,परिवार से टूटा समझा नहीं क्या समीकरण है।
न पाठ पाठशाला का पढ़ा,बस तानों की छड़ी खाई है।
स्त्री-पुरुष के बीच की ये दशा अब तलक नहीं बुझाई है।
स्त्री के स्त्रीत्व का मान है। पुरुष के पुरुषत्व का मान है।
हम क्या हैं! क्यों है! हमारा क्यों इतना अपमान है?
लिंग भेद के बीच में फंसे! नपुंसक,अलैंगिक,किन्नर बने,
भूँख है जरूरत से मजबूर हैं,मजबूरी में देह बेचने।
क्या कोशिश करें?कितना धैर्य धारें?के वो समझेंगे।
ना शिक्षा है,ना दीक्षा है,ना काया है,ना मोह माया है।
धन्य शिव-शक्ति स्वरूप,जिनके दैव्य ने देना सिखाया है।
अब तो राहत देने को हमें,दिव्य जनों ने कानून बनाया है।
क्या समाज हमारी व्यथा-कथा थोड़ी भी समझ पाया है?
नहीं चाहिए देव सा मान,ना अलौकिक दिव्यता का सम्मान।
देना हो तो दीजिये हमें सम जीवन जीने का अधिकार।
माता-पिता से प्राप्त परवरिश,सामान्य शिक्षा हो स्वीकार।
दिल में आशा है हमें दिलासा ना दो,बराबर बिठाओ।
इंसान हैं,भावनाएं जिंदा हैं। हमें तमाशा ना बनाओ।
सच स्वीकारो हमारा,तमाशा ना बनाओ,तमाशा ना बनाओ।
