दिखावा
दिखावा
मैंने तुम्हारे अलावा कभी किसी को चुना ही नहीं, क्योंकि मैं चुन ही नहीं सकती। हां, चुनने का दिखावा जरूर किया है और शायद ऐसा करने की जरूरत भी थी, क्योंकि मुझे खुद से डर लगता है कि जो मैं करती हूं उसे प्यार कहें, बेचैनी कहें या पागलपन? कभी समझ ही नहीं आता!
इस मोड़ पर आकर खुद को पाने या खोने का सवाल बचा ही नहीं, बल्कि सोचती हूं कि खुद को रोकना कैसे है। प्यार में तो खैर इंसान अपनी दुनिया में रहता ही कहां है, और बेचैनी में इंसान को पता ही नहीं होता कि दुनिया कहां है। तभी तो नंबर ब्लॉक होने पर भी मैं दिन भर में दस नहीं, बल्कि सौ सौ बार फोन लगाती हूं।
तुम ही सोचों, इस तरह बार-बार कॉल करते रहना,सही है क्या?
बीच रात में नींद से जागना और रात भर सोने की कोशिश करते रहना, सही है क्या?
बार-बार उसी इंसान को देखते रहना, जिसे देखने की जरूरत ही नहीं, सही है क्या?
बस यही सारे सवाल और सवालों के जवाब में फंसी रह जाती हूं मैं।
ऐसी बहुत सी मेरी हरकतें हैं, जिसे प्यार नहीं कह सकते, शायद बेचैनी भी नहीं कह सकते पर हां, पागलपन जरूर कह सकते हैं और मुझे इसी पागलपन से डर लगता है। मैं कभी-कभी तो शांत रह जाती हूं, खुद को समझा लेती हूं, पर कभी-कभी मन इतना अशांत होता है कि खुद को समझने और समझाने का तरीका ही नहीं समझ आता, ऐसा लगता है कि गुस्से में सब बर्बाद कर दूं पर अंदर ही अंदर चीजों की उथल-पुथल को शांत करने में लग जातीं हूं। कभी सोचती हूं व्यस्त रहूंगी तो ध्यान भटका रहेगा पर मैं तो ऐसी हूं कि व्यस्त होने के बाद भी सारे काम को टालने लग जातीं हूं और चुपचाप बैठ जाती हूं पर ये तो मैं ही जानती हूं कि मन में कितना शोर होता है और कितनी अशांति होती है
बस, इसी एक कारण से कभी कभी प्यार में आकर मैं तुम्हारी तरफ एक एक कर कदम तो बढ़ाती हूं और फिर बेचैनी में आकर 10 कदम पीछे ले लेती हूं। मुझे लगता है कि सिर्फ मैं ही खुद को संभाल सकती हूं और मुझे संभालना तुम्हारे या किसी और के बस की बात है ही नहीं। मुझे खुद ही खुद को संभालना जरूरी है, पर यह बात तुम्हें बताना मैं बिल्कुल जरूरी नहीं समझती। इसलिए मैं दिखावा करूंगी कि मैं बार बार किसी और को चुनने का दिखावा करूंगी।
