दहलीज़
दहलीज़
औरत को ही क्यूं दहलीज़ का पाठ पढ़ाया जाता है।
इस दहलीज़ को पार नहीं करना, सिखाया जाता है।
दहलीज़ केवल घर के दरवाज़े की ही नहीं कहा है।
दहलीज़ को औरत ने शर्म मर्यादा संस्कार में सहा है।
सबसे ऊंची बड़ी चौड़ी होती है विचारों की दहलीज़।
कुछ लोग पार नहीं करते, जिनके विचार हों गलीज़।
कुछ कुंठित एवं कुछ पुराने अड़ियल बेबुनियाद विचार।
पत्नी को दबाकर रखें,मां बहनों पर करते हैं अत्याचार।
जब तक लोग शिक्षित नहीं होंगे, नहीं करेंगे सुविचार।
सिमटे रहेंगे अज्ञानता की दहलीज़ में, नहीं करेंगे पार।
औरत चाहे एक छोटी सी दुनिया, अपनों का हो साथ।
बच्चों की खुशी में खुश रहे, साथी के हाथों में हो हाथ।
एक आम औरत के बहुत बड़े नहीं होते ख़्वाब अरमान।
उस को तो चाहिए बस उसकी हो अपनी एक पहचान।
बनकर ना रहे किसी की दासी, चले उसी का फ़रमान।
ज़्यादा तो नहीं मांगती औरत, बस एक खुला आसमान।
एक औरत होती है अपने इरादों की बहुत ही बलवान।
महजबीं भी और घर में सबके लिए होती है भाग्यवान।
