दहेज प्रथा एक कुरीति
दहेज प्रथा एक कुरीति
अरे ओ दहेज के लालचियों तुम क्या जानो ये बेटियां..
अपना सबकुछ छोड़ तुम्हारे घर को महकाने आती है और तुम
उन बेटियों पर दहेज के लिए जुल्म ढाते हो...उन्हें सताते हो....
बंद करो उन बेटियो को सताना, बंद करो उन पर ज़ुल्म ढहाना,
पिता अपनी जीवनभर की पूंजी, मां अपने कलेजे के टुकड़े को सौंप देती
इस आशा में कि तुम उसका वैसे ही ध्यान रखोगे जैसे वो रखते हैं...
प्यार ममता का स्नेह भरा आंचल उनके सिर पर रखा होगा
यह सोच वो अपने मन को समझा देते हैं..
बहन जैसी ननद भाई जैसा देवर मिला होगा
इस आशा में बहन भाई खुश हो लेते हैं,
मायके की याद कभी नहीं आएगी मेरी लाडो को
यह सोच परिवार वाले बेटियों को आपके हाथ में सौंप संतुष्ट हो जाते हैं,
पर सच्चाई से अनजान वो परिवार...
जो लाडो को आती एक चोट पर सहम जाते थे वो लाडो
आज उस परिवार में किस प्रकार प्रताडित होती है नहीं जानते वो...
सचमुच तुम तो बहु नहीं पैसे लाने वाली तिजोरी चाहते हो...
धिक्कार है तुम्हारी सोच पर.. जो सोने से ज्यादा पीतल को महत्व देते हो...,
सचमुच बंद करो यह प्रथा जिसने बहु को पैसों से तोल दिया ..
कहते हैं घर की बहु स्वयं लक्ष्मी होती है और तुम उस
लक्ष्मी का अपमान कर तुच्छ क्षणभर की लक्ष्मी को मान देते हो....
सचमुच धिक्कार है तुम्हारी और समाज की सोच पर।
