ढाई लाख झूठ
ढाई लाख झूठ
तेरी झूठी कलम-सियाही से,
होते जो कागज़ ज़ाया हैं
आग से झुलसे लोगों में,
तेरा दूर जो ठंडा साया है
तेरे वक़्त की रंगी रेत का ही,
शीशा तेरा भेस दिखाएगा
सच क़ब्र चीर कर आएगा
तेरी छाती फूल के चौड़ी है,
और सांसों के मोहताज हैं हम
तू भीड़ जुटाता फिरता है,
और इक लावारिस लाश हैं हम
चीख़ें अब दर्ज भले ना हो,
सन्नाटा ही चिल्लाएगा
सच क़ब्र चीर कर आएगा।
