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Mayank Verma

Abstract Tragedy Inspirational

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Mayank Verma

Abstract Tragedy Inspirational

दौर

दौर

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क्यों परेशान हो, ये गहरे बादल छँटने दो

शिकन हटाओ, माथे का पसीना हटने दो

क्यों जलना तंज़ और तानों की तपिश में

इनकी अगन को ज़रा घटने दो


ये दौर है ज़िंदगी का, जैसा भी मगर दौर ही है

इसके बाद जीने का मज़ा कुछ और ही है


दिल के उफानों को थमने दो,

खयालों के सैलाबों को जमने दो,

दिन महीनों की गिनती को छोड़ो,

इन लम्हों को गुजरने दो


देखा है करीब से ये दौर, अच्छा बुरा पर दौर ही है

इसके बाद जीने का मज़ा कुछ और ही है


जायज़ है सब सवाल तुम्हारे

क्यों बंदिशों में कोई ज़िंदगी गुज़ारे

क्यों अपनी मन मर्ज़ी नहीं कर सकते

क्यों ढोना है उन्हें जो होने थे सहारे


आसान नहीं फैसलों का दौर, मुश्किल है डगर मगर दौर ही है

इसके बाद जीने का मज़ा कुछ और ही है


संभालो कदम, इन शोलों को राख में बदलने दो

रस्मों रिवाजों की बर्फ़ को पिघलने दो

ठहरो सांस लो, वक्त की धारा बहने दो

जैसी चलती है दुनियादारी, वैसे ही चलने दो


पहले भी कई बार गुज़रा है दौर, ये भी एक दौर ही है

इसके बाद जीने का मज़ा कुछ और ही है।।


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