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बिमल तिवारी "आत्मबोध"

Romance

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बिमल तिवारी "आत्मबोध"

Romance

चूड़ियां

चूड़ियां

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“चूड़ियां” ---
 खनक-खनक ये चूड़ियां, कुछ कहती हर बार, रंगों में ये बसी हुई, नारी का संसार।

 कांच की हों, सोने की हों, या हों चाँदी की,
हर आहट में छुपी हुई, बातें अनकही सी। सपनों की ये सहेली हैं, हँसी की ये तान, मुस्कानों की परछाई हैं, जीवन की पहचान।
 जब-जब हाथों में सजीं, खुशियों का त्योहार,
खनक उठे हर एक गली, हर आँगन हर द्वार।
 पर इनकी भी एक सच्चाई, दिल को छू जाती,
मजबूती की छवि दिखाकर, पल में टूट जाती।
 नारी जैसी ये चूड़ियां, बाहर से मजबूत, अंदर से कोमल बहुत, सह लेती हर चोट।

 जब ये टूटे चुपके से, आवाज़ नहीं करती, पर मन के किसी कोने में, हलचल सी भरती। इनकी खनक में छुपी हुई, त्याग की हर बात, हर रंग में दिखती रहती, जीवन की सौगात। कमजोरी इनकी यही है, नाजुक सा है रूप, पर महत्व इनका इतना, जैसे चाँद का रूप। चूड़ियां केवल गहना नहीं, भावों का विस्तार, हर स्त्री के जीवन का ये, मधुर सा श्रृंगार। खनक में इनके छुपा हुआ, हर सुख-दुख का राग, चूड़ियां बस चूड़ियां नहीं—जीवन का अनुराग…


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