चुप्पी
चुप्पी
लोगों के घर जल गए, आवाज़ उठकर ढल गई,
उठता धुआँ बहता चला, फिर दया की कमी खल गई।
एक समाज देखता रहा, कितनी ही पुकारें चीखकर खामोश हो गईं,
इंसान ने बनाई थी इसलिए इंसानियत भी एहसान-फ़रामोश हो गई।
तूफ़ान के बादल छाते रहे, उम्मीद की धूप ढलती रही,
सच्चे दिये बुझा दिए, दिखावटी मशालें जलती रहीं।
अपनी महफ़िल सजाए बैठी रही दुनिया, कुछ आँखें मजबूरी में सनी रहीं,
बाहर शोर था बनावटी खुशियों का, अंदर एक लंबी, नाराज़ चुप्पी बनी रही।
