चलो सफर पर निकलते हैं मिलकर
चलो सफर पर निकलते हैं मिलकर
बहुत दिन हुए, कहीं साथ नहीं गये घूमने शहर से बाहर,
चलो आज तुम और मैं, सफर पर निकलते हैं मिलकर।
कहाँ जाएंगे यह तो बाद की बात है, पर निकलना है बाहर,
चाहे अनजानी हो हमारी डगर, चाहे अनजाना हो वो सफर।
रोजमर्रा की जिन्दगी से निकल, चलो कही चलें हम बाहर,
घूमेंगे, झूमेंगे, और करेंगे मस्ती, गाँव गाँव, शहर, शहर।
चलो चलते हैं बहुत दूर कहीं, चलते हैं साथ नये सफर पर,
हाथों में हो हाथ एक दूजे का, चलो चलें हम प्रीत की डगर।
किसी पेड़ की छाँव तले बैठकर, चलो घंटों हम बतियाएंगे,
किसी झील के किनारे बैठकर, थोड़ा वक़्त साथ बिताएंगे।
किसी रिक्शे में बैठेंगे यूँ ही, एक दूजे का कुछ होगा साथ,
नुक्कड़ पर बैठ कर पी लें चाय, पकड़ एक दूजे का हाथ।
दिल से अगर मिलता है दिल, तो चलते हैं आज बाज़ार,
मैं खरीद लूंगा सब्जियाँ सारी, तुम खरीद लेना दो अनार।
मोहल्ले की गलियाँ हमें बुला रही, चलो लगाते हैं चक्कर,
चलो सुबह की सैर करा दूँ, साइकिल पर तुम्हें बिठाकर।
रोज की बोर जिन्दगी से निकल, कुछ नया कर दिखाते हैं,
उम्र हो गई तो क्या हुआ, पैरों को फिर चलना सिखाते हैं।
रोज की खींचा तानी से निकल, भाव कुछ नये सजाते हैं,
क्या रोज बजती एक ही धुन, आज एक नई धुन बजाते हैं।
जिन रास्तों को भूल गये थे, उन्हीं रास्तों को याद करते हैं,
रिश्तों की कड़वाहट मिटाकर, फिर खुद को आबाद करते हैं।
गिले शिकवे कुछ ना रहे अब, ऐसी नई शुरुआत करते हैं,
जिन्दगी खुशियों से भर जाए, ऐसा एक इंतजाम करते हैं।
चलो ऐसे सफर पर चलें हम, जो सफर बस चलता रहे,
ऐसी एक राह पर बढ़े हम, कदम बस आगे बढ़ता रहे।
सफर तो अब होगा आसान, अगर साथ चलते रहे हम,
खुशियाँ ही खुशियाँ हो मन में, न हो अब कोई भी गम।
