चकोर
चकोर
संगमरमर की सफेद सी चादर,
चारों ओर बिछाए था।
जहां भी देखो चमक चांदनी,
ऐसा रंग फैलाए था ।।
शर्मीली इठलाती चकोरी,
श्वेत वर्ण के पंथ चले।
चांद चकोरी की कुंडली पढ़ने,
जीव जंतु बन संत चले।।
ओस की बूंदे सज गई तन पे,
ऐसे चमके गहनों सी।
श्वेत श्याम से पंख सजाए,
श्वेत पोशाक वो पहने थी।।
शीत पवन बन गई सहेली,
सजी चकोरी के संग चले।
एक ओर वैकुंठ सजा था,
देव चंद्र के चरण तले।।
खंड मिश्री सी धूल कंकरी ने,
कैसा चकोर से बैर किया ।
पहुंच ना पाई मेरे नाथ ने,
कितनी ऊपर धाम लिया।।
धीरे-धीरे अंबर छोड़े,
लुप्त हो रहा क्षतिज से ।
नित ही ब्याह का स्वांग किया है,
बेरी चंद्र ने मुझसे।।
मैं तो प्रतिदिन राख बनू,
तुझसे बिरहा की पीड़ा है।
प्रेम मोह मेरा फिर तन गांठें,
ये तो नित की क्रीडा है।।
