STORYMIRROR

विनोद महर्षि'अप्रिय'

Romance

4  

विनोद महर्षि'अप्रिय'

Romance

चित की चाह

चित की चाह

1 min
280

खोया तुझमे अब मैं दीवाना सा बन गया

शमा को देख मैं भी परवाना सा बन गया

रहता था मस्त मयूर अपने ही ख्यालो में

मिजाज अब मेरा आशिकाना सा बन गया।


यह कैसे हुआ कब हुआ मुझे जवाब मिला नहीं

देखा तुझे तो लगा ऐसा कुसुम और खिला नहीं

रहता था मैं जिस सहजादी के ख्वाबो में हमेशा

अब किया दीदार तेरा तो किसी से भी गीला नहीं।


पर अब भी खुद को तन्हा सा मैं पाता हूं

महसूस करता इस प्रसून की मादक महक

हर डाल पर कोकिल का बसेरा ढूंढता हु

कभी तो आकर सुरीली चिडीयां सी चहक।


बंजर वन के इस सुनसान प्रांगण में बसेरा मेरा है

तू बन मेघ सी आकर इसको हरितमा से भर दे

कचोटती मुझे यह दूरी इंतजार बस अब तेरा है

इस बियावान में आकर तू दिल मे सुकून भर दे।


बताऊँ क्या तुझको की बिन तेरे मैं कौन हूं

तू है वन कूकरी मेरी, लफ्ज तेरे बसन्त गीत है

सुनना तुझे हर पल चाहूं तभी तो मैं मौन हूँ

अब निभा प्यार से जो इस जीवन की रीत है।


महता तेरी क्या है कोई आकर पूछे मुझसे

बिन तुझ मैं तो खाली हूँ थार ज्यों बिन आबादी

तू कब तक तड़पायेगी यूँ मुझे पूछूँ मैं तुझसे

कर हरा भरा थार को ओ सपनों की शहजादी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance