Independence Day Book Fair - 75% flat discount all physical books and all E-books for free! Use coupon code "FREE75". Click here
Independence Day Book Fair - 75% flat discount all physical books and all E-books for free! Use coupon code "FREE75". Click here

Kumar Vikash

Tragedy


4.0  

Kumar Vikash

Tragedy


चीर हरण

चीर हरण

1 min 195 1 min 195

जब पीड़ित मन पर शर्म के पर्दे पड़े हों

तो एक नारी भला उस चीर हरण की

व्यथा किस तरह कहे ,


व्यथित है दुखी है वो घबराई सी देखती

चहुँ ओर है पर इस कलियुग में भला

कोई कृष्ण उसे कैसे मिले !


बीत गया द्ववापर, पर अब भी धृतराष्ट्र

वही हैं और आँखों में बाँध पट्टी मोहपाश

में फंसी मंदोदरी घर-घर विचर रही हैं ,


अंत हुआ नहीं दुशासन और दुर्योधन का

पांडव भी सत्ता विहीन हैं तो ऐसे में भला

किसी अबला को न्याय कैसे मिले !!


Rate this content
Log in

More hindi poem from Kumar Vikash

Similar hindi poem from Tragedy