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सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”

Romance

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सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”

Romance

छुअन

छुअन

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पिघलती नज़रों की तपन

वो कोमल कोमलांगी की छुअन

बिन परस बेचैन है मन। 


आहन के पंख हुये धूमिल 

निशा ने चादर तामस फैलायी

रजनी लगी करवट बदलने

तड़पते हृदय में है जलन। 


ढूँढते हैं उन्हें प्यासे नयन

पूछते रहते हैं पता बहारें चमन

बहके हिंडोलों के सताये

रगों में है मीठी-मीठी दुखन। 


वह बिछड़ते पहर याद आये

विवश अनबोले अकुलाते से

आँखें अलसाई-अलसाई सी

बाजुओं में मेरी है सूना गगन। 


दीये लौ की लगी थरथराने

निंद्रा में हैं नयन आसमां ताके

बुझ रहे जगमगाते तारे

आसक्त है मस्ती में भुवन

वो कोमल कोमलांगी की छुअन। 



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