स्वप्नों की स्मृति के पथरीले पथ पर
स्वप्नों की स्मृति के पथरीले पथ पर
यादों की गलियों में हमने
स्वप्नों की स्वर्णिम अँखियों में
हल्की कौंध सी ही देखी थी
कपोल-कल्पित कथाओं को
सजीव दिवा-स्वप्नों सा
यादों के हाटों में चलचित्र जैसा
घुमड-घुमड कर पटल पर
बनते बिगडते धागों सा
उलझे-उलझे हुए वचनों में
स्वप्नों की स्मृति जैसा ||1||
रे उक्थ तुम विचलित क्यूँ....?
हर मोड पर पलट कर देखते क्यूँ....?
जो मुझ पर तुझ पर बीत रही
वह तो
पूर्व जन्मों का अधूरा कर्ज है
इस जन्म वह पूरा कर रहे हम दोनों
तन की पीडा से जब मैं विचलित नहीं
तब तुम स्मृति को कुरेदते क्यू....?।। 2।।
थी आकांक्षायें छोटी कडी को बढाने की
आशायें उसी पथ पर चलीं थी
मगर; नजर लग गई तुम पर
कालिख पोत दिये अपनों ने
धकेल दिये एकांत में निभृत वन में
खोजते बीत गये बीस बरस
तब मिली उलझी-उलझी अपनों में
उखड़े-उखड़े स्वरों में उडेलते
पिघले शीशे कर्णों में चक्षुओं में।। 3।।
स्मृति भागती देखती.... ; क्यों...? किसलिये....?
स्वप्नों को कुचलती बातें कहाँ से.....
!!!.....?
कहती तुम सत्यपथ पर क्यों चले
शब्दों को नीम के रस में क्यूँ डुबोया
नहीं जानते या जानना नहीं चाहा
तुम घोर कलयुग में जन्में हो
मधु में डुबो कर असत्य को सत्य बनाकर
कहना था; मगर; तुम; तुम ही हो
शिव शब्दों में स्मृति में कृष्ण हो
विचारों में दुर्गा कर्मों में त्रिपुरा हो
कैसे छोड सकते सत्य पथ को
इसलिए चुन लिये मौन पथ को।। 4।।
स्वप्नों को आकांक्षाओं को आशाओं पर
लगा रहे अब विश्व कल्याण में
मनु के मन को सत्य पथ दिखा रहे
भटकते पथिकों को धर्म की ज्योति
ज्योत्स्ना की शीतलता में दिखा
भाष्कर के शरण में ले जा रहे
खुद टूटते; गुबार उर में भर;
अपने पुद्गल से पूँछते
मेरा कर्म सही है न
कहीं भटका तो नहीं
तलाशते स्मृति के स्वप्नों में
माँ के बताये पथ पर
इष्ट की ऊँगली पकडे चल रहा
स्वप्नों की स्मृति के पथरीले पथ पर
निरंतर........ ........ ......... शिव के चरणों तक।।5।।
✍️ सतीश शेखर श्रीवास्तव "परिमल"
