akhilesh kumar
Thriller
चौराहे सूनसान हैं
फांसी पर चढ़ा दो
मेरी आवाज
जैसे पाश
मरने के बाद जिन्दा हैं
नागार्जुन
केदारनाथ
मैं भी जिन्दा रहूंगा
कुछ लोग
मरने के बाद भी
जिन्दा रहते
जम्हूरियत के लिए
लड़ने के वास्ते।
तजुर्बे से सम...
जनता
नपुंसक
चौराहे सूनसान...
कोई शहर
मुझे पता है
पगडंडी
अमेरिका
लड़कियां
नदियों में
कहीं देवदार के पेड़, कहीं चीड़ सामने खड़े हैं यहाँ के मौसम के भी, सूना है मिज़ाज बड़े हैं कहीं देवदार के पेड़, कहीं चीड़ सामने खड़े हैं यहाँ के मौसम के भी, सूना है मिज़ाज...
जो खयाल कभी आया नहीं क्या यह वह हकीकत है जो खयाल कभी आया नहीं क्या यह वह हकीकत है
पर प्रकृति की क्रोध के आगे मनुष्य बड़ा लाचार है। पर प्रकृति की क्रोध के आगे मनुष्य बड़ा लाचार है।
इस निविड़ बने जीवन में फिर से आनंद की इक लहर बह जाने दे। इस निविड़ बने जीवन में फिर से आनंद की इक लहर बह जाने दे।
हर पल पल इज़हार कमिल-तरिन किया एक पल इकरार शिकस्त-फरिश्ता किया ! हर पल पल इज़हार कमिल-तरिन किया एक पल इकरार शिकस्त-फरिश्ता किया !
यूँ इस दुनिया से जाने के बाद भी हमारी कहानी को … उस के शब्दों को आबाद करेंगे यूँ इस दुनिया से जाने के बाद भी हमारी कहानी को … उस के शब्दों को आबाद करेंगे
श्वेत है अम्बर, श्वेत है धरा, शिशिर का प्रकृति कृति से आत्मसात। श्वेत है अम्बर, श्वेत है धरा, शिशिर का प्रकृति कृति से आत्मसात।
हम उनका सोचा करते थे , दिल से निभाया करते थे l हम उनका सोचा करते थे , दिल से निभाया करते थे l
बस मेरा दर्द पहचानो.. दिल रोता तुमसे दूर रहकर, अन्दर ही अन्दर मचलकर..! बस मेरा दर्द पहचानो.. दिल रोता तुमसे दूर रहकर, अन्दर ही अन्दर मचलकर..!
बस ज़रुरत है तो समझने वालों की, इनकी मौन भाषा पढ़ने वालों की। बस ज़रुरत है तो समझने वालों की, इनकी मौन भाषा पढ़ने वालों की।
हमारी ज़रूरत के लिए, हम अच्छे कमरे आसपास में ढूँढ़ने लगे। हमारी ज़रूरत के लिए, हम अच्छे कमरे आसपास में ढूँढ़ने लगे।
एक तरफ था पर्वत उंचा और एक तरफ गहरी थी खाई एक तरफ था पर्वत उंचा और एक तरफ गहरी थी खाई
जवान बेटे पर हाथ जैसे बाप का नहीं चलता। जवान बेटे पर हाथ जैसे बाप का नहीं चलता।
राम तुम्हारे राज वंश में, कैसे-कैसे लोग हुए, रोज पूजते हैं तुमको पर, मन में रावण रहता राम तुम्हारे राज वंश में, कैसे-कैसे लोग हुए, रोज पूजते हैं तुमको पर, मन में र...
उलझनों की माला उतारके फेंक दो गले से मायावी जाल में कब तक यूँ अटकते रहोगे। उलझनों की माला उतारके फेंक दो गले से मायावी जाल में कब तक यूँ अटकते रहोगे।
मेरी बच्ची तुम यह न सोचना कि मैं तुम्हारे अरमानों को दबाना चाहती हूं, मैं तो बस कुछ भेड़ियों क... मेरी बच्ची तुम यह न सोचना कि मैं तुम्हारे अरमानों को दबाना चाहती हूं, मैं ...
व्यथा व्यथा
फिर आहिस्ता-आहिस्ता अपनी नम प्रेम भूमि को कर देती हूँ समर्पण फिर आहिस्ता-आहिस्ता अपनी नम प्रेम भूमि को कर देती हूँ समर्पण
तू लड़की नहीं चंचला है। तुझे देख कर मेरा दिल तुझ पर डोला है। तू लड़की नहीं चंचला है। तुझे देख कर मेरा दिल तुझ पर डोला है।
अपने कर्मों से बनती जग, पुरुषत्व की यही परिभाषा।। अपने कर्मों से बनती जग, पुरुषत्व की यही परिभाषा।।