akhilesh kumar
Thriller
चौराहे सूनसान हैं
फांसी पर चढ़ा दो
मेरी आवाज
जैसे पाश
मरने के बाद जिन्दा हैं
नागार्जुन
केदारनाथ
मैं भी जिन्दा रहूंगा
कुछ लोग
मरने के बाद भी
जिन्दा रहते
जम्हूरियत के लिए
लड़ने के वास्ते।
तजुर्बे से सम...
जनता
नपुंसक
चौराहे सूनसान...
कोई शहर
मुझे पता है
पगडंडी
अमेरिका
लड़कियां
नदियों में
यही क्रम निरंतर चलता रहेगा, हर साल जिंदगी का पन्ना पलटता रहेगा। यही क्रम निरंतर चलता रहेगा, हर साल जिंदगी का पन्ना पलटता रहेगा।
मिलन के लिये आई है लेकिन, तड़प पहले जैसी नहीं है। मिलन के लिये आई है लेकिन, तड़प पहले जैसी नहीं है।
जब कुछ बुरा घटित होता है और हम उसके दर्शक बनते हैं जब कुछ बुरा घटित होता है और हम उसके दर्शक बनते हैं
मैं भारत देश की मातृभाषा, राष्ट्रभाषा हूँ, मै हिन्दी भाषा हूँ। मैं भारत देश की मातृभाषा, राष्ट्रभाषा हूँ, मै हिन्दी भाषा हूँ।
नफ़रत की आग बुझाकर मुझ पर, प्यार की नदियाँ तू बहा जाना। नफ़रत की आग बुझाकर मुझ पर, प्यार की नदियाँ तू बहा जाना।
मेरे कोमल दिल का तुम स्पर्श कर लो, दिल की धड़कन को महसूस कर लो, मेरे कोमल दिल का तुम स्पर्श कर लो, दिल की धड़कन को महसूस कर लो,
फिर भी दुनिया कहती है की, मैं तेरे दिल से करीब नहीं हूं। फिर भी दुनिया कहती है की, मैं तेरे दिल से करीब नहीं हूं।
इस जोश -ए वतन में कुछ कह रही साँसें मेरी इस जोश -ए वतन में कुछ कह रही साँसें मेरी
यहां वह महकती हुई आवाज से जिसमें भाई बहन का प्यार लाखों करोड़ों से आबाद है यहां वह महकती हुई आवाज से जिसमें भाई बहन का प्यार लाखों करोड़ों से आबाद है
बस वो थे क्षण एक अनिश्चित यात्रा काल खंड की स्थान रूका था॥ बस वो थे क्षण एक अनिश्चित यात्रा काल खंड की स्थान रूका था॥
इसके साथ चलना सीखो, हर राह में मुसीबतें हैं, यह एक अपना खेल है। इसके साथ चलना सीखो, हर राह में मुसीबतें हैं, यह एक अपना खेल है।
हर बार नयी चेतना से मैं फिर खड़ा हो जाऊंगा हर बार नयी चेतना से मैं फिर खड़ा हो जाऊंगा
फरेबी इश्क को मैं पहचान गया हूं, फरेबी इश्क को मैं पहचान गया हूं,
मैं किसान, मैं नौकर, मैं मजदूर हूं मैं भी सम्मान चाहता हूं मैं किसान, मैं नौकर, मैं मजदूर हूं मैं भी सम्मान चाहता हूं
फिर आई मुसीबत सामने जल का स्तर था लगा बढ़ने फिर आई मुसीबत सामने जल का स्तर था लगा बढ़ने
विश्व की गहराइयों में, अनंत ज्ञान की कहानी, यही हूं मैं, जगह बनाने वाली विचारों की मल विश्व की गहराइयों में, अनंत ज्ञान की कहानी, यही हूं मैं, जगह बनाने वाली विचा...
क्या खोया क्या पाया, वो दिन तो ऐसे ही निकले।। क्या खोया क्या पाया, वो दिन तो ऐसे ही निकले।।
नये कुछ साल में हमको मौसम पर सोचना होगा! नये कुछ साल में हमको मौसम पर सोचना होगा!
लगता है की मैं तुझ से मिलता रहूंगा, कल तक भी मैं तुझे मिलता था और, लगता है की मैं तुझ से मिलता रहूंगा, कल तक भी मैं तुझे मिलता था और,
मैं हूँ जरिया खुशियों का...! मैं हूँ जरिया खुशियों का...!