इसे क्या नाम दूं।
इसे क्या नाम दूं।
इश्क़, सजा, रज़ा, कर्म - धर्म का वो काम नहीं है।
ना इंसान, न जानवर, न जीव, न हैवान, उसका कोई नाम नहीं है।
ढूंढ सको तो ढूंढो उसको, क्या पता तुम में वो घात लगाए बैठा हो।
कर ले तू ये पाप भी, इसका भी नुकसान कर, हर पल तुमसे वो ये कहता हो।
देखा है कभी खुद को पाप का भागीदार बनते हुए?
जब कुछ बुरा घटित होता है और हम उसके दर्शक बनते हैं
तो हम अंदर से ख़ुद को कहते हैं कि शायद हमें ये रोकना चाहिए ।
मगर फिर एक और आवाज़ आती है :
जिसका वर्णन या व्याख्या कुछ ऐसी सी है ,
छोड़!
क्यों पड़ता तू इसमें, जो हुआ है वो होना है।
समय समय की बात है, दृश्य ये और भी घिनौना है।
ना तू रोक सकता इसको, ना इसने ख़ुद चुप होना है।
तू मान या ना मान, ये दुनिया उपर वाले का खिलौना है।।
अब ये क्या है, इसके लिए कौन सा नाम दिया जाए ?
मैं वाकिफ नहीं हूं ।।।
