मुझको रोक न पाओगे
मुझको रोक न पाओगे
मैं बहता जल हूँ नदियों का
तुम कितने बाँध बनाओगे
आवेग में बहता जाऊँगा
तुम मुझको रोक न पाओगे
एकलव्य सी एकाग्रता है मुझमें
तुम कितने अंगूठे काटोगे
हर लक्ष्य को पाता जाऊँगा
तुम मुझको रोक न पाओगे
मैं वीर अभिमन्यु की माटी का हूँ
तुम कितने षड्यंत्र रच पाओगे
हर चक्रव्यूह को भेद बढूँगा
तुम मुझको रोक न पाओगे
मिटने वाला मैं नाम नहीं
तुम कितने जतन लगाओगे
हर पत्थर की धार पर
हीरा बनता जाऊँगा
तुम मुझको रोक न पाओगे
कर कोशिश जितनी कर पाओ
तुम कितने बाण चलाओगे
खुद की ढाल मैं स्वयं बनूँगा
तुम मुझको रोक न पाओगे
मैं जल जल कर स्वयं रोशन हुआ
तुम कितने ग्रहण लगाओगे
आसमान का चीर के सीना
फिर रोशन हो जाऊँगा
तुम मुझको रोक न पाओगे
मैंने संघर्षों में जीवन पाया
तुम कितना ज़ोर लगाओगे
तुम कितना मुझको गिराओगे
हर बार नयी चेतना से मैं फिर खड़ा हो जाऊंगा
तुम मुझको रोक न पाओगे
मैं अब वो मोम का बुत नहीं
तुम कितने पत्थर फेंकोगे
हर कंकड़ को थाम मैं
चट्टान बनता जाऊँगा
तुम मुझको रोक न पाओगे
मैं अब वो नन्ही चिंगारी नहीं
तुम कितना मुझसे खेलोगे
अग्नि से भरी ज्वाला बनूँगा
तुम इसमें स्वयं जल जाओगे
तुम मुझको रोक न पाओगे
