धरती की धुन - प्रकृति
धरती की धुन - प्रकृति
धरती का श्रृंगार निराला
जैसे हो अमृत का प्याला
इन्द्र देव की बरखा की ताल
ने मस्त करदी मोहक मयूर की चाल
धरा माँ के आँचल में अम्बर
कहीं हरी दुशाला कहीं पुष्प सुंदर
इक ओर सरिता गाती गीत
इक ओर कल कल झरना छेड़ता संगीत
सतरंगी इंद्रधनुष से आकाश रमा
यूँ ही नहीं है धरती उसकी प्रियतमा
कोयल के मृदुल स्वर से हुआ वन चकित
नन्हे हिरन की अठखेलियों से हुए सब पुलकित
सूरज चंदा तारे इसके अलंकार के अंग
पवन, मेघ, जल इसे देख बजाते मृदंग।

