चाँद ओर वो
चाँद ओर वो
बरसात की हसीन रात थी
मेरा हमदम मेरे साथ था
एक तूफान था घर के बाहर
एक तूफान मेरे दिल में था
भीगे हुए थे बो कुछ इस कदर
नशा बढ़ गया फिर बरसात का
लरजै जो उनके होंठ कुछ कहने को
जलता हुआ दीया भी काँप गया
बिजली के डर से लिपटे जो मुझसे
ना मुझे, ना उनको होश रहा
आंखों से छूट गया सैलाब अश्कों का
हर तरफ पानी ही पानी गिरता रहा
बाते भी हुई पर हुई कुछ इस तरह
ना इस सिरे का पता ना उस सिरे का पता
बारिश थमी तो चाँद भी चमका हौले से
मेरे सीने में उसने खुद को छुपा लिया।

