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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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बुनाई

बुनाई

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कभी कढ़ाई से तो कभी बुनाई से। 

रिश्तों का कद बढ़ाया है हमने 

खूबसूरत सिलाई से।

पैबंद न लगे कभी।

इसलिए पैमाने पर भी

नाप लेते हैं हम कभी कभी।

जाले न लगे इसलिए बार-बार

झाड़ लेते हैं सभी।

रिश्तों को संभाल लेते हैं बढ़ आगे सभी ।



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