बसंत
बसंत
प्रकृति के भी अनोखे रंग छूटे हैं
हर और नए कोपल फूटे है
हर तरफ एक अद्भुत छटा छाई है
प्रकृति भी फिर मुस्कुराई है
हर एक पल कुछ पल का फसाना
मौसम को आना और फिर जाना है
आज पतझड़ है तो बहार को कल
फिर आना है
हर एक बसंत को, यही सबको
बताना है
शाखों से जो पत्ते गिरे हैं तो नए
खिलेंगे भी
आज कुछ बिछड़े है तो कल कुछ
नए मिलेंगे भी
यही बात सबको बताती
ऋतु बसंत हर साल आती है
मौसम हुआ फिर से सुहाना है
फिर कुछ नए जोड़े को मिलना है
कुछ नई कहानी बनाना है
बसंत का यह इतिहास पुराना है
