बंटे हुए लोग...
बंटे हुए लोग...
किश्तों में मिलती हैं यहाँ
दुनिया के बाज़ार में
तमाशा-ए-ज़िंदगी...
सोच में दरार,
दिल में दबी-दबी-सी घुटन...
दिमागी माथापच्ची में
यूँ ही बीत जाती है
शाम-ए-ज़िंदगी...
ये कभी न खत्म होनेवाला
सिलसिला-ए-इंतज़ार...
बस भीड़ में शामिल
अनजान चेहरों की
आननफानन आवाजाही..
और बेइंतहा सूनापन...
क्यों अपने ही धुन में
आगे निकल जाने की होड़... ?
कैसी ये तपीश... ?
कैसा ये बेगानापन ?
और कितनी हेराफेरी
चलती रहेगी
इस रंग-ए-महफिल में...??
