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Archana Tiwary

Abstract


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Archana Tiwary

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बिटिया

बिटिया

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मां मैं तेरे घर की चिड़िया 

देख पंख हो गए तेरे जैसे उड़ लेने दो

न आकाश में जानती हूं चली जाऊंगी एक दिन

नए आशियाने में पंख तो होंगे


फिर भी पर आकाश न होगा मेरे हिस्से का 

मर्यादा के जंजीर में जकड़ी जाऊंगी 

चख लेने दो न तेरे हाथों का स्वाद 

फिर कहां लांघ पाऊंगी उस दहलीज को


रोज-रोज कहां उस स्वाद से मिल पाऊंगी 

कभी खिला कर सबको खुद भूखी सो जाउंगी 

आज छोटी-छोटी जीद पूरी कर लेने दो

न फिर मेरी जीद भी कहां "जिद" रहेगी 


खुद रूठ कर खुद ही मान जाऊंगी 

मां मैं तेरे घर की चिड़िया मुट्ठी भर आकाश दे दो न 

मेरे हिस्से की उड़ान भर लेने दो न।


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