STORYMIRROR

Rashmi Prabha

Tragedy

4  

Rashmi Prabha

Tragedy

बिना स्याही

बिना स्याही

1 min
379

उन लम्हों का हिसाब हम क्यूँ करें

जिन पर होनी की पकड़ थी

हम कितना भी कुछ कहें

हमारी राहें जुदा थीं

तुम आकाश लिख रहे थे

मैं पिंजड़े की सलाखों से

आकाश को पढ़ना चाह रही थी ...


बिना स्याही

तुमने बहुत कुछ लिखा

और बन्द कमरे की स्याह घुटन में

मैंने बहुत कुछ पढ़ा

तुम लिखना नहीं भूले

मैं पढ़ना नहीं भूली

पर अतीत के वे पन्ने

जो अनचाहे लिखे गए

उनको मैं पढ़ना नहीं चाहती

क्या तुम उन शब्दों को

मिटा सकते हो ?


यकीन करो -

अभी भी मेरे पास खाली स्लेट है

और कुछ खल्लियाँ

और कुछ मनचाही इबारतें

वक़्त भी है -

तो लिखो कुछ मनचाहा

ताकि इस बार

खुली हवा में मैं पढ़ सकूँ

सबकुछ सहज हो जाये ...


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy