बहती नदिया, उथला पानी
बहती नदिया, उथला पानी
जीवन की है यही कहानी,
बहती नदिया और उथला पानी!
कल थे जिनके नाम वाम बहुत,
आज वो नाम एकदम से गुम गये !
जो सोचा करते थे कि दुनियाँ,
सदा रहेगी बंद उनकी मुठ्ठी में !
धरती से जब नाता टूटा तो,
जल के हो गये खाक भट्टी में !
जो करते थे खुद पे बहुत गुरूर ,
सारा आसमान मुठ्ठी में रखते थे !
जल के हो सब खाक हो गए,
बस राख ही मुठ्ठी भर रह गये !
जीवन का है यही फसाना,
इक दिन रूखतस होना है!
टुट गयें सारे उनके सपने,
धरे रह गये उनके फ़साने !
माया दौलत भी खूब बटोरें,
बहुत बनाये महल चौबारे !
धरें रह गयें सब धरा पर सारे,
बस खाली मुठ्ठी लेक़र हारे !
