भ्रष्टाचार और युग देश समाज
भ्रष्टाचार और युग देश समाज
1-भ्रष्टाचार और युग देश समाज
भ्रष्टाचार से खोखला देश
राष्ट्र समाज ।।
भ्रष्टाचार भय कमजोरी
संस्कृति संस्कार।।
भ्रष्टाचार दीमक धीरे धीरे
करता समाप्त सत्य अर्थ
बुनियाद।।
भ्रष्टाचार से कायर कमजोर
कायर युग काल।।
भ्रष्टाचार नहीं जानता रिश्ता
नाता जाती पाती का भेद भाव
भ्रष्टाचार अन्याय अत्याचार का
पर्याय नहीं माँ के गर्भ से पनपता भ्रष्ट भ्रष्टाचार।।
युग में तो जन्म लेता माँ की कोख से
सिर्फ अबोध मानव नहीं
जानता है संसार।।
निहित स्वार्थ की कोख से
जन्म लेता भ्रष्टाचार।।
अंधा बहरा गूंगा हो जाता
युग समाज।।
भ्रष्ट भ्रष्टाचारी ही शक्ति
सत्ता का आधार।।
समाज युग करुण क्रंदन
करता बेबस लाचार।।
अब अंत, तब अंत, कब अंत
के चक्कर में नित नए प्रयोग
करता युग समाज।।
भ्रष्टाचार राजनीति राज्य नीति
शासन शासक का शनै शनै अंत
अग्रसर प्रवाह।।
भ्रष्टाचार शोषित दलित समाज
निर्माण का शैली सत्यार्थ।।
भ्रष्टाचार में नीति नियत भी
बेबस लज्जित का समय काल
भ्रष्टाचार से विपत्ति आवाहन
रुदन विलाप।।
2-भ्रष्टाचार और भारत हिंदुस्तान--
भारत के कण कण में बस गया
भ्रष्टाचार त्राहि त्राहि सर्वत्र नहीं
कोई उपाय।।
युवा ,प्रौढ़, वृद्ध जवान, किसान
व्यवसायी, व्यापार हर तरफ जय
जय भ्रष्टाचार।।
कहते है वैद्य चिकित्सक होते
भगवान भ्रष्टाचार की ताकत
देखो जीते मरते का करते इलाज।।
जांच में कमीशन ,दावा में कमीशन,
पग पग पर कमीशन ,।।।
मरीज मर जाये या जिंदा हो
नैतिकता का नाम नहीं
कहते है वैद्य चिकित्सक भाग्य
भगवान अब तो भाग्य का भगवान
ही रक्त पिपासा शैतान।।
शासन सत्ता राजनीति की बात
निराली राजनीति में भय, भ्रष्टाचार
शान स्वाभिमान ।।
हत्या, लूट, डकैती, बलात्कार से आभूषित
सता राजनीतिक भारत के भाग्य विधान।।
बात करे प्रशासन की तो क्या बात
भ्रष्टाचार ही शक्ति शान स्वाभिमान
गर भ्रष्टाचार की परम्परा का नहीं
करते निर्वाह।।
शक्ति संविधान से वंचित अज्ञानी
अपराधी निराकार निर्विकार नीति
नियत राजनीति से अंजान।।
शिक्षा हो स्वस्थ हो शासन या
प्रशासन हो यंत्र तंत्र सर्वत्र भय
भ्रष्टाचार अब संस्कृति संस्कार।।
न्याय की बात निराली सुकराना
नज़राना का भ्रष्टाचार व्यवहार।।
न्याय खरीदे और बेचे जाते
खुले आम बाज़ार।।
बात करे लोकतंत्र के चौथे
स्तंभ की तो निष्पक्ष नहीं
बिकता बिना मोल भाव।।
आज का युवा वर्ग खोज
रहा अपने ही हताश निराश।।
समझ नहीं पा रहा करें क्या
जाए किस ओर।।
हर नई भावना का जोश
उत्साह कसमें खाता भ्रष्टाचार
को उखाड़ कर फेंको पर आखिर
जाता थक हार ।।।
स्वयं भी समय
काल के संग चलता जाता।।
भ्रष्टाचार सिर्फ जन जन की
जागृति जागरण संकल्प से
ही होगा समाप्त।।
चाहे जितनी भी सरकारें आये
जाए शासन और प्रशासन बदले
कुछ भी ना कर पाएंगे।।
भ्रष्टाचार मिटेगा गर जन मानस की
सोच, समझ बदलेगा दृढ़ इच्छा शक्ति
संकल्पों का होगा स्वच्छ समाज।।
लालच, लोभ, भौतिकता की चकाचौंध
से होगा दूर नैतिकता मर्यादा का समय
समाज की क्रांति शंखनाद भ्रष्टाचार का इलाज।।
